Kavita Jha

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वो बारिश #लेखनी प्रतियोगिता -27-Dec-2021

वो बारिश ....

छोटी सी मोबाइल की दुकान, और  बेहिसाब भीड़ उस पर आज दुकान में एक ही लड़का था, उसके बाकी दोस्त आज उसके साथ काम पर नहीं आऐ थे। इतने सारे लोगों को एक साथ संभालना उसके लिए  बड़ा ही कठिन था।

दुकान की सीढ़ियों पर खड़ी अराध्या सोच रही थी कहीं गलती तो नहीं कर दी, अभी इस समय यहाँ आकर। मौसम अच्छा ही था जब घर से निकली थी, सूरज देवता बादलों में छुपे थे। धूप नहीं थी, फिर भी उसने छतरी अपने साथ रख ली थी।

बेटे ने सुबह कहा था, " मम्मा मैं चलूंगा आपके साथ। " वो खुश थी कि शायद उसके मन की छोटी सी ख्वाहिस पूरी हो जाऐ। पर एक औरत अपने मन का करने से पहले अपने घर परिवार को देखती है। अचानक घर में मेहमान आने से और सबका नाश्ता पानी संभालते उसे लग रहा था कि शायद आज भी वो ना जा पाऐ, अपने सपने को पूरा ना कर पाए। एक मोबाइल ही तो लेना चाहती थी अपने लिए, जिसके लिए वो कई सालों से पैसे जोड़ रही थी।

दुकान के पास खड़ी अराध्या भूखी निगाहों से नजरें बचने की पूरी कोशिश कर रही है। वो ईलाका सही नहीं है, पास में ही देसी शराब की दुकान और हड़िया (झारखंड की देसी शराब) बेचने वाली कई औरतें वहाँ बैठी रहती और  वहाँ नशेड़ियों का अड्डा जमा रहता, जानती थी वो फिर भी अकेले आ गई थी। दिन का समय है सोचा नही था उसने कि ऐसी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा उसे।

उस दुकान पर भी सभी नशेड़ी ही जमा थे, भूखे भेड़ियों की तरह सबकी निगाहें और ज्यादा अराध्या के वक्ष स्थल पर ही टिक गई जब अचानक बारिश तेज होने से उसको छतरी खोलने का समय भी ना मिला, जब तक छतरी खोलती तब तक पूरी भीग गई थी।

बेटा भी नाराज हो नहीं आया था उसके साथ, जब तक मेहमान गए बेटे का मूड भी बदल गया और  बोला, " अब नहीं जाऊंगा, मेरा मन नहीं है, तुम पहले क्यों नहीं चली। "
कैसे कहती अराध्या मेरे मन से क्या होगा, जब घर के कामों से फुर्सत मिले तभी तो सोच पाऊंगी अपने लिए।

उसकी आवाज वो लड़का सुन ही नहीं पा रहा था, तेज बारिश की बौछारों से उसकी दुकान के टीन की छत से होता शोर, फिर उन शराबियों का शोर शराबा।
"जल्दी कर बे, पहले मेरा मोबाइल रिचार्ज़ कर। " कोई कह रहा तो कोई पहले मेरा नम्बर। नजरें तो अराध्या पर ही थी  सबकी और  वो डरी सहमी, भीगी हुई एक कोने में छतरी हाथों में पकड़े खड़ी थी। दुकान के अंदर जाने की हिम्मत ही नहीं थी उसमें,  डर उसकी आँखों में तैर रहा था। तभी तेज हवा के संग होती तेज बारिश से अराध्या की छतरी दूर जा गिरी।
वो अपने सपनों को पूरा होते हुए ना देख सकी, वो मोबाइल खरीदने का ईरादा छोड़ अपनी छतरी को उठा चल दी। उसकी छतरी के पास चार कुत्ते बैठे थे, डर तो अराध्या का दुकान पर ही छूट गया था। उसकी सुरक्षा करते हुऐ चारों कुत्ते उसके साथ साथ भीगते हुऐ चल दिए।
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी और अराध्या वहाँ कुछ पल और  रुक नहीं सकती थी। घर के गेट तक वो चारों रक्षक उसके साथ आऐ। अराध्या उस बरसात में सुरक्षित अपने घर पहुंच तो गई पर मन में एक ही सवाल था, औरत और डर पर्यायवाची शबद है क्या?? अपनी सुरक्षा के  लिए अपनी इच्छाओं को मारना कब तक उचित है।
बारिश तो रुक गई, उसने अपने गीले कपड़े बदल बालों को सुखाया, पर आँखो से बहती बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

समाप्त
कविता झा  'काव्या कवि '

#लेखनी

#लेखनी कहानी प्रतियोगिता

27.12.2

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5 Comments

Seema Priyadarshini sahay

28-Dec-2021 08:56 PM

बहुत सुंदर लिखा आपने।

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Ali Ahmad

28-Dec-2021 09:53 AM

घर से निकलने से पहले वह पर्दानशी हर बात का ख्याल करती है। आखिर तजुर्बेकार नजरो से कोई बच भी तो नही सकता।

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Shrishti pandey

28-Dec-2021 08:34 AM

Awesome

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